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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ओषन्ती) जलाती हुई, (समोषन्ती) भस्म कर देती हुई, तू [वेदनिन्दक के लिये] (ब्रह्मणः) ब्रह्म [परमेश्वर] का (वज्रः) वज्ररूप है ॥५४॥
भावार्थभाषाः - वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें ॥५४॥
टिप्पणी: ५४−(ओषन्ती) उष दाहे−शतृ। दहन्ती (समोषन्ती) सम्यग्भस्मीकुर्वती (ब्रह्मणः) परमेश्वरस्य (वज्रः) शस्त्रं यथा ॥
