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सा ब्र॑ह्म॒ज्यं दे॑वपी॒युं ब्र॑ह्मग॒व्यादी॒यमा॑ना मृ॒त्योः पड्वी॑ष॒ आ द्य॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सा । ब्रह्मऽज्यम् । देवऽपीयुम् । ब्रह्मऽगवी । आऽदीयमाना । मृत्यो: । पड्वीशे । आ । द्यति ॥७.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:15


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह (आदीयमाना) छीनी जाती हुई (ब्रह्मगवी) वेदवाणी (ब्रह्मज्यम्) ब्रह्मचारियों के हानिकारक, (देवपीयुम्) विद्वानों के सतानेवाले पुरुष को (मृत्योः) मृत्यु की (पड्वीशे) बेड़ी में (आ द्यति) बाँध देती है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - आप्त वैदिक विद्वानों को रोकनेवाला पुरुष मूर्खता के कारण महा विपत्तियों में पड़ता है ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(सा) पूर्वोक्ता (ब्रह्मज्यम्) अ० ५।१९।७। कविधौ सर्वत्र प्रसारणिभ्यो डः। वा० पा० ३।२।३। ब्रह्म+ज्या वयोहानौ−ड। ब्रह्मचारिणां हानिकरम् (देवपीयुम्) अ० ४।३५।७। विदुषां हिंसकम् (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (आदीयमाना) अपह्रियमाणा (मृत्योः) मरणस्य (पड्वीशे) अ० ६।९६।२। पश बन्धने−अटि, डित्+विश प्रवेशने−क, दीर्घश्च। पाशप्रवेशे। शृङ्खलायाम् (आद्यति) आङ्पूर्वो दो बन्धने। बध्नाति ॥