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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) यदि (हुताम्) दान की हुई [आचार्य से सीखी हुई], (यदि) यदि (अहुताम्) न दान की हुई [बल से ली हुई] (वशाम्) कामनायोग्य [वेदवाणी] को (अमा) अपने घर में (च) ही (पचते) मनुष्य विख्यात करता है। (सब्राह्मणान्) ब्रह्मचारियों सहित (देवान्) विद्वानों को (ऋत्वा) दुखाकर (जिह्मः) वह कुटिल (लोकात्) समाज से (निःऋच्छति) निकल जाता है ॥५३॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष वेदविद्या को प्राप्त करके वा छल-कपट से लेकर उसके प्रचार से विद्वानों को रोके, उस दुःखदायी को विद्वान् लोग पद से गिरा देवें ॥५३॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ५३−(यदि) सम्भावनायाम् (हुताम्) दत्ताम्। आचार्येण दत्ताम् (यदि) (अहुताम्) अदत्ताम्। बलात्कारेण गृहीताम् (अमा) गृहे (च) (पचते) व्यक्तीकरोति (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (देवान्) विदुषः (सब्राह्मणान्) सहितान् (ऋत्वा) हिंसित्वा (जिह्मः) जहातेः सन्वदाकारलोपश्च। उ० १।१४१। ओहाक् त्यागे−मन्। कुटिलः। मन्दः (लोकात्) दर्शनीयात् समाजात् (निर्ऋच्छति) बहिर्गच्छति ॥
