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परं॑ मृत्यो॒ अनु॒ परे॑हि॒ पन्थां॒ यस्त॑ ए॒ष इत॑रो देव॒याना॑त्। चक्षु॑ष्मते शृण्व॒ते ते॑ ब्रवीमी॒हेमे वी॒रा ब॒हवो॑ भवन्तु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परम् । मृत्यो इति । अनु । परा । इहि । पन्थाम् । य: । ते । एष: । इतर: । देवऽयानात् । चक्षुष्मते । शृण्वते । ते । ब्रवीमि । इह । इमे । वीरा: । बहव: । भवन्तु ॥२.२१॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:21


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मृत्यो) हे मृत्यु ! [मृत्युरूप दुर्बलेन्द्रिय पुरुष] (यः) जो (ते) तेरा (एषः) यह (देवयानात्) विद्वानों के मार्ग से (इतरः) भिन्न [बुरा मार्ग है, उस बुरे मार्ग से] (परम्) उत्तम (पन्थाम् अनु) मार्ग पर (परा इहि) पराक्रम से चल। (चक्षुष्मते) उत्तम नेत्रवाले (शृण्वते) सुनते हुए (ते) तेरे लिये (ब्रवीमि) मैं उपदेश करता हूँ, (इह) यहाँ (इमे) यह सब (वीराः) वीर लोग (बहवः) बहुत से (भवन्तु) होवें ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जो दुर्बलेन्द्रिय आत्मघाती कुमार्गी पुरुष हैं, वे आँखों और कानों को खोलकर उपदेश सुनें और दुराचारों को छोड़ कर विद्वानों के समान वीरों की संख्या बढ़ावें ॥२१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१८।१। तथा यजु० ३५।७ ॥
टिप्पणी: २१−(परम्) उत्तमम् (मृत्यो) हे मृत्युरूप दुर्बलेन्द्रिय पुरुष (अनु) अनुसृत्य (परा) पराक्रमेण (इहि) गच्छ (पन्थाम्) मार्गम् (यः) (ते) तव (एषः) (इतरः) भिन्नः। कुमार्गः (देवयानात्) विदुषां मार्गात् (चक्षुष्मते) प्रशस्तनेत्रयुक्ताय (शृण्वते) श्रवणं कुर्वते (ते) तुभ्यम् (ब्रवीमि) उपदिशामि (इह) संसारे (इमे) वीराः (बहवः) बहुसंख्याकाः (भवन्तु) ॥