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शिरो॒ हस्ता॒वथो॒ मुखं॑ जि॒ह्वां ग्री॒वाश्च॒ कीक॑साः। त्व॒चा प्रा॒वृत्य॒ सर्वं॒ तत्सं॒धा सम॑दधान्म॒ही ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शिर: । हस्तौ । अथो इति । मुखम् । जिह्वाम् । ग्रीवा: । च । कीकसा: । त्वचा । प्रऽआवृत्य । सर्वम् । तत् । सम्ऽधा । सम् । अदधात् । मही ॥१०.१५॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:15


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हस्तौ) दोनों हाथों, (शिरः) शिर, (अथो) और भी (मुखम्) मुख, (जिह्वाम्) जीभ, (ग्रीवाः) गले की नाड़ियों, (च) और (कीकसाः) हंसली की हड्डियों (तत् सर्वम्) इस सबको (त्वचा) खाल से (प्रावृत्य) ढक कर (मही) बड़ी (संधा) जोड़नेवाली [शक्ति, परमेश्वर] ने (सम् अदधात्) मिला दिया ॥१५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने तत्त्वों के संयोग-वियोग से प्राणियों के अङ्गों को बनाकर और ऊपर से खाल में लपेट कर एक दूसरे में मिला दिया है। यह गत मन्त्र का उत्तर है ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(जिह्वाम्) रसनाम् (ग्रीवाः) अ० २।३३।२। कन्धरावयवान् (च) (कीकसाः) अ० २।३३।२। जत्रुवक्षोगतास्थीनि (त्वचा) चर्मणा (प्रावृत्य) आच्छाद्य (सर्वम्) (तत्) पूर्वोक्तम् (सन्धा) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।१।१३६। इति संदधातेः कर्तरि-क प्रत्ययः। सन्धानकर्त्री शक्तिः परमेश्वरः (मही) महती। अन्यत् पूर्ववत्-म० १४ ॥