98 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राण) हे प्राण ! [जीवनदाता परमेश्वर] (क्रन्दाय) दहाड़ने के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार, (स्तनयित्नवे) बादल की गर्जन के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार है। (प्राण) हे प्राण ! [परमेश्वर] (विद्युते) बिजुली के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार, (प्राण) हे प्राण ! [परमेश्वर] (वर्षते) वर्षा के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की दया को विचारकर ऐसा प्रयत्न करें कि वर्षासम्बन्धी सब क्रियाएँ सर्वथा उपकारी होवें ॥२॥इस मन्त्र का मिलान अथर्व० का० १ सू० १३ म० १ से करो ॥
टिप्पणी: २−(नमः) (ते) तुभ्यम् (प्राण) म० १। हे जीवनप्रद (क्रन्दाय) क्रदि आह्वाने रोदने च-पचाद्यच्। ध्वनिहिताय (स्तनियत्नवे) अ० १।१३।१। मेघगर्जनहिताय (विद्युते) अ० १।१३।१। विद्युद्धिताय (वर्षते) वृष्टिहिताय। अन्यत् पूर्ववत् ॥
