श्या॒वाश्वं॑ कृ॒ष्णमसि॑तं मृ॒णन्तं॑ भी॒मं रथं॑ के॒शिनः॑ पा॒दय॑न्तम्। पूर्वे॒ प्रती॑मो॒ नमो॑ अस्त्वस्मै ॥
पद पाठ
श्यावऽअश्वम् । कृष्णम् । असितम् । मृणन्तम् । भीमम् । रथम् । केशिन: । पादयन्तम् । पूर्वे । प्रति । इम: । नम: । अस्तु । अस्मै ॥२.१८॥
अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:18
67 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - जो सर्वज्ञ, अनन्त सामर्थ्ययुक्त परमेश्वर दुष्टों को दण्ड देता और सूर्य आदि लोकों को रचता है, उसकी उपासना से हम अपना बल बढ़ावें ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जो सर्वज्ञ, अनन्त सामर्थ्ययुक्त परमेश्वर दुष्टों को दण्ड देता और सूर्य आदि लोकों को रचता है, उसकी उपासना से हम अपना बल बढ़ावें ॥१८॥
