वांछित मन्त्र चुनें

यो॒भिया॑तो नि॒लय॑ते॒ त्वां रु॑द्र नि॒चिकी॑र्षति। प॒श्चाद॑नु॒प्रयु॑ङ्क्षे॒ तं वि॒द्धस्य॑ पद॒नीरि॑व ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । अभिऽयात: । निऽलयते । त्वाम् । रुद्र । निऽचिकीर्षति । पश्चात् । अनुऽप्रयुङ्क्षे । तम् । विध्दस्य । पदनी:ऽइव ॥२.१३॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:13


60 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [दुष्कर्मी] (अभियातः) हारा हुआ (निलयते) छिप जाता है, और (रुद्र) हे रुद्र ! [दुःखनाशक] (त्वा) तुझे (निचिकीर्षति) हराना चाहता है। (पश्चात्) पीछे-पीछे (तम्) उसका (अनुप्रयुङ्क्षे) तू अनुप्रयोग करता है [यथा अपराध दण्ड देता है], (इव) जैसे (विद्धस्य) घायल का (पदनीः) पद खोजिया ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जो दुष्ट गुप्त रीति से भी परमेश्वर की आज्ञा का भङ्ग करता है, परमेश्वर उसे दण्ड ही देता है, जैसे व्याध घायल आखेट के रुधिर आदि चिह्न से खोज लगा कर उसे पकड़ लेता है ॥१३॥इस मन्त्र का मिलान करो-अ० १०।१।२६ ॥
टिप्पणी: १३−(यः) दुष्कर्मी (अभियातः) अभिगतः। अभिभूतः सन् (निलयते) निलीनो गुप्तो भवति (त्वाम्) (रुद्र) म० ३। हे दुःखनाशक (निचिकीर्षति) डुकृञ् करणे, यद्वा, कृञ् हिंसायाम् सन्। निराकर्तुं नितरां हिंसितुं वेच्छति (पश्चात्) निरन्तरम् (अनुप्रयुङ्क्षे) अनुप्रयोगं करोषि। यथापराधं दण्डयसि (तम्) दुष्टम् (विद्धस्य) ताडितस्य। क्षतस्य (पदनीः) पद+णीञ् प्रापणे-क्विप्। पदचिह्नानां नेता। पदानुगामी (इव) यथा ॥