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ब्रह्म॒ श्रोत्रि॑यमाप्नोति॒ ब्रह्मे॒मं प॑रमेष्ठिनम्। ब्रह्मे॒मम॒ग्निं पूरु॑षो॒ ब्रह्म॑ संवत्स॒रं म॑मे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ब्रह्म । श्रोत्रियम् । आप्नोति । ब्रह्म । इमम् । परमेऽस्थिनम् । ब्रह्म । इमम् । अग्निम् । पुरुष: । ब्रह्म । सम्ऽवत्सरम् । ममे ॥२.२१॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:21


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुषः) मनुष्य (ब्रह्म=ब्रह्मणा) ब्रह्म [वेद] द्वारा (श्रोत्रियम्) वेदज्ञानी [आचार्य] को और (ब्रह्म) वेद द्वारा (इमम्) इस (परमेष्ठिनम्) सबसे ऊपर ठहरनेवाले [परमात्मा] को (आप्नोति) पाता है। उस [मनुष्य] ने (ब्रह्म) वेद द्वारा (इमम्) इस (अग्निम्) अग्नि [सूर्य, बिजुली और पार्थिव अग्नि] को, (ब्रह्म) वेद द्वारा (संवत्सरम्) संवत्सर [अर्थात् काल] को (ममे) मापा है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - यह गत मन्त्र का उत्तर है। मनुष्य वेद द्वारा आचार्य और परमेश्वर की आज्ञा पालन करे और सूर्य और काल आदि से उपकार लेवे ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(ब्रह्म) सुपां सुलुक्। पा० ७।१।३९। तृतीयार्थे सु। ब्रह्मणा। वेदज्ञानेन। परमेश्वरेण। अन्यत् पूर्ववत्−म० २० ॥