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परि॑ वः॒ सिक॑तावती ध॒नूर्बृ॑ह॒त्य॑क्रमीत्। तिष्ठ॑ते॒लय॑ता॒ सु क॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि । व:‍। सिकताऽवती । धनू: । बृहती । अक्रमीत् । ‍तिष्ठत । इलयत । सु । कम् ॥

अथर्ववेद » काण्ड:1» सूक्त:17» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

नाडीछेदन [फ़सद् खोलने] के दृष्टान्त से दुर्वासनाओं के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सिकतावती) सेचन स्वभाव [कोमल रखनेवाली] बालू आदि से भरी हुई (बृहती) बड़ी (धनूः) पट्टी ने (वः) तुम [नाड़ियों] को (परि अक्रमीत्) लपेट लिया है। (तिष्ठत) ठहर जाओ, (सु) अच्छे प्रकार (कम्) सुख से (इलयत) चलो ॥४॥
भावार्थभाषाः - १−(धनूः) अर्थात् धनु चार हाथ परिमाण को कहते हैं। इसी प्रकार की पट्टी से जो सूक्ष्म चूर्ण बालू से वा बालू के समान राल आदि औषध से युक्त होवे, उससे चिकित्सक घाव को बाँध देवे, कि रक्त बहने से ठहर जाये और घाव पुरकर सब नाड़ियाँ यथानियम चलने लगें, मन प्रसन्न और शरीर पुष्ट हो। २−मनुष्य कुमार्गगामिनी मनोवृत्तियों को रोककर यत्नपूर्वक हानि पूरी करे और लाभ के साथ अपनी वृद्धि करे और आनन्द भोगे ॥४॥
टिप्पणी: ४−वः। युष्मान्, नाडीः। सिकतावती। पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१११। इति सिक सेचने-अतच् टाप्। सेचनवती, कोमलस्वभावयुक्ता। वालुयुक्ता। धनूः। कृषिचमितनिधनिसर्जिखर्जिभ्य ऊः स्त्रियाम्। उ० १।८०। इति धन धान्योत्पादने, रवे च-ऊ। धनुः=चतुर्हस्तपरिमाणम्। तत्परिमाणवस्त्रपट्टी। बृहती। वर्तमाने पृषद्बृहन्महज्जगच्छतृवच्च। उ० २।८४। इति बृह वृद्धौ−अति। ङीप्। महती। अक्रमीत्। क्रमु पादविक्षेपे−लुङ्। क्रान्तवती, व्याप्तवती। तिष्ठत। निवृत्तगतयो भवत। इलयत। इल गतौ। गच्छत, चेष्टध्वम्। कम्। सुखेन ॥